आई सी एन भारत : वैश्विक प्रकाश स्तंभ

वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में आई सी एन  भारत का जन्म भादो माह के कृष्ण पक्ष की काली तूफानी रात में कृष्ण के जन्म सदृश घटना है।  जब सारा विश्व खानों में बँट कर अपने अपने स्वार्थ की रक्तरंजित राजनीति का शतरंज खेलने में व्यस्त है, उस समय भारतीय संस्कृति ही एक ऐसी खिड़की है जहाँ से प्रकाश और प्राणवायु की संभावना अभी भी जीवित है।
राजनीति से बड़ी चीज़ समाजनीति है। समाज राजनीति से नहीं बल्कि समाजनीति से चलता है। समाज सामंजस्य से, सद्भाव, स्वतंत्रता से और समानता से चलता है। राजनीति के शाब्दिक अर्थ भले ही कुछ और हों लेकिन आज ‘राजनीति’ शब्द एक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मुहावरा मात्र बन कर रह गया है और इस शब्द के साथ लगभग हर स्तर पर नकारात्मकता चस्पा हो गई है।
इसी क्रम में ‘भारत’ शब्द के शाब्दिक अर्थ भले ही कुछ भी हों लेकिन आज ‘भारत’ भी एक अंतर्राष्ट्रीय मुहावरा है किंतु इस शब्द के साथ हर स्तर पर सकारात्मकता आलोकित होती है। आज सारी दुनिया मानती है कि भारत का अर्थ है – उदारता, सहिष्णुता, सामंजस्यता, मानवता और मित्रता। भारत का मतलब है – विवेक, तपस्या और संवेदना। विश्व के किसी भी भाग में जब तोपें आग उगलती है तो पीड़ा भारत को होती है। भूख चाहे पाकिस्तान में चहल कदमी करे, बागंलादेश में नृत्‍य करे या गाजापट्टी पर अट्टहास करे,  भारत की आँखें नम हो जाती हैं। हमारे बहुत से देशों के साथ बहुत अच्छे संबंध हैं, कुछ देश ऐसे भी हैं जिनसे हमारे वैचारिक मतभेद हैं लेकिन हम सदैव मानवता के ही पक्षधर हैं। हम संपूर्ण विश्व को अपना कुटुंब मानते हैं और अपनी थाली को भी अतिथि के साथ साझा करना हमारा संस्कार है। जिस तरह धूप, वर्षा व हवा किसी सरहद को स्वीकार नहीं करते, उसी प्रकार भारत की मानवीय नीति की कोई सीमा नहीं है। दुख चाहे सरहद के इस पार का हो या उस पार का, वह सदैव हमें विचलित करता है।
विश्व के अने देश अपनी धार्मिक कट्टरता के चलते न केवल मानवता के मूलभूत उद्देश्य से ही भटक गये हैं बल्कि विकास की राह में भी कहीं बहुत पीछे रह गये हैं। वास्तव में कट्टरता धार्मिक नहीं बल्कि सदैव सामाजिक व प्राकृतिक होनी चाहिए। हमें समाज के लिये व प्रकृति के लिये कटिबद्ध होना चाहिये न कि ईंटों व गारे से बने धर्मस्थलों के लिये।
भारत विभिन्न धर्मों, जातियों, पंथ, मतों व संप्रदायों का देश है लेकिन हम सब एक हैं और हम सभी शांति के उपासक हैं और हर भारतीय साझा चूल्हा व सामंजस्य शैली में अडिग विश्वास रखता है जबकि इस विश्व में अनेकों देश सामाजिक व राजनीतिक दोनों दृष्टियों से एक धर्म, एक जाति, एक पंथ, एक मत व एक संप्रदाय के होने के बावजूद गंभीर जानलेवा विभिन्नताओं से युक्त हैं और नित्य प्रति विघटन व गृहयुद्ध के नये प्रतिमान गढ़ रहे हैं। ऐसे सभी देश जो धार्मिक कट्टरता से ग्रसित हैं, आज अपने ही रक्त से रंजित दिखाई देते हैं और अगर उनमें से कुछ देश शांति और विकास से प्रभावित हैं तो केवल इसलिए कि उन्होंने अपनी अर्थहीन धार्मिक कट्टरता से छुटकारा पा लिया है।
कभी कभी मुझे आश्चर्य होता है कि ईश्वरीय कृतियों में कोई मानव निर्मित धर्म लिंग, स्थान, रंग व शैली केआधार पर विभेद कैसे कर सकता है। समय आ गया है जब हमें एकमत होकर यह सुनिश्चित करना ही होगा कि धर्म मानव के लिये है, मानव धर्म के लिये हर्गिज नहीं। हम अपना जीवन धर्म के अनुसार नहीं बल्कि अपनी परिस्थितियों के अनुसार जीते हैं और हमारा विकास व हमारा अर्थ तंत्र ही हमारी दिशा निर्धारित करता है।
पड़ोसी श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार व बांगला देश आज जब गृहयुद्ध की ज्वाला में झुलस रहे हैं तो वे मुखर रूप से अपने अपने देशों की गृह व धार्मिक नीतियों को अस्वीकार करते हैं और साथ ही भारतीय गृह नीति की सार्थकता पर अपनी शर्तहीन मोहर भी लगाते हैं।
जब विश्व रूस व युक्रेन तथा इजरायल व फिलस्तीन के लंबे युद्धों की फिसलन भरी ढलान से सरकता हुआ तीसरे विश्वयुद्ध के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है, आई सी एन भारत एक शांति मंच के रूप में अस्थिर विश्व को स्थिरता का संदेश देगा और हम अंतर्राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में भारतीयता को और अधिक प्रासंगिक, प्रमाणिक व मुखर बना सकेंगे – ऐसा मेरा विश्वास है।
– तरुण प्रकाश श्रीवास्तव

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